लोकतांत्रिक समाज में पत्रकारिता को “चौथे स्तंभ” के रूप में देखा जाता है, जिसकी भूमिका केवल सूचना संप्रेषण तक सीमित नहीं होती, बल्कि सत्ता की निगरानी, जनमत का निर्माण और सार्वजनिक विमर्श को सुदृढ़ करना भी होती है। जर्गन हाबर्मास के अनुसार, मीडिया लोकतांत्रिक पब्लिक स्फीयर का केंद्रीय आधार है।
किन्तु 2014 के बाद भारतीय पत्रकारिता में जो परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं, वे इस सार्वजनिक क्षेत्र के क्षरण की ओर संकेत करते हैं। यह परिवर्तन राजनीतिक सत्ता, बाज़ार शक्तियों और मीडिया के कॉरपोरेट चरित्र के अंतर्संबंधों से उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है।
नोम चॉम्स्की और एडवर्ड हरमन (हरमन एंड चॉम्स्की, 1988) अपने प्रोपेगंडा मॉडल में तर्क देते हैं कि मीडिया संस्थान पूंजी, विज्ञापन और सत्ता संरचनाओं से प्रभावित होकर कार्य करते हैं। 2014 के बाद भारतीय मीडिया में यह मॉडल अधिक स्पष्ट रूप में उभरता है।
टीआरपी आधारित प्रतिस्पर्धा ने समाचार को वस्तु में परिवर्तित कर दिया है। गंभीर सामाजिक–आर्थिक प्रश्नों के स्थान पर उत्तेजक बहसें, भावनात्मक राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण को प्राथमिकता दी जाने लगी। रॉबर्ट मैकचेस्नी (मैकचेस्नी, 2004) इसे “मीडिया का बाज़ारी अधिग्रहण” कहते हैं, जिसमें लाभ जनहित पर हावी हो जाता है।
भारतीय मीडिया की बढ़ती निर्भरता विशेष रूप से सरकारी विज्ञापनों पर, संपादकीय स्वतंत्रता के लिए चुनौती बनकर उभरी है। पी. साईनाथ (साईनाथ, 2013) पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि जब मीडिया का वित्तीय अस्तित्व सत्ता पर निर्भर हो जाता है, तब उसकी आलोचनात्मक क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
2014 के बाद यह प्रवृत्ति और गहरी हुई, जहाँ सत्ता से प्रश्न पूछने के बजाय कई मीडिया संस्थान उसके नैरेटिव को पुनरुत्पादित करते दिखाई देते हैं। यह स्थिति “वॉचडॉग” पत्रकारिता से “प्रचारक” पत्रकारिता की ओर संक्रमण को दर्शाती है।
इस दौर में टेलीविजन पत्रकारिता में एंकर-केन्द्रित पत्रकारिता का उभार हुआ। एंकर स्वयं समाचार का विषय बन गए। हाबर्मास के अनुसार, लोकतांत्रिक विमर्श की शर्त तर्कसंगत संवाद है, न कि शोर या दमन (हाबर्मास, 1989)।
परंतु भारतीय मीडिया बहसें प्रायः आरोप–प्रत्यारोप, राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह जैसे द्वंद्वों में सिमट गईं। इससे न केवल वैचारिक विविधता घटी, बल्कि असहमति को भी अवैध ठहराया जाने लगा।
डेविड हार्वे (हार्वे, 2005) नवउदारवादी व्यवस्था में श्रम के असमान मूल्यांकन की बात करते हैं। यही प्रवृत्ति 2014 के बाद मीडिया संस्थानों में भी स्पष्ट दिखाई देती है।
कुछ चुनिंदा एंकरों को अत्यधिक वेतन और संसाधन उपलब्ध हैं, जबकि फील्ड रिपोर्टर, स्ट्रिंगर और कैमरापर्सन अल्प वेतन, अस्थायी अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में कार्यरत हैं। यह असमानता पत्रकारिता को एक सामूहिक लोकतांत्रिक पेशे के बजाय कॉरपोरेट पदानुक्रम में बदल देती है।
अमर्त्य सेन (Sen, 2005) के अनुसार, लोकतंत्र केवल चुनाव की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सार्वजनिक बहस और असहमति की संस्कृति है। मीडिया में आलोचनात्मक स्वर का संकुचन लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है।
2014 के बाद भारतीय मीडिया में आलोचना को राष्ट्रविरोधी या नकारात्मक कहकर खारिज करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे वैकल्पिक दृष्टिकोण मुख्यधारा से बाहर धकेले गए।
इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि 2014 के बाद भारतीय पत्रकारिता में आया परिवर्तन केवल संपादकीय पसंद का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक सत्ता, बाज़ारवाद और मीडिया स्वामित्व की संरचनात्मक जटिलताओं का प्रतिफल है।
यदि पत्रकारिता को लोकतंत्र का प्रभावी स्तंभ बने रहना है, तो उसे विज्ञापन–निर्भरता, एंकर–केन्द्रित शोर और वैचारिक संकुचन से बाहर निकलकर पुनः जनहित, तर्क और बहुलता के मूल्यों की ओर लौटना होगा।
(नीरज कुमार का लेख। नीरज कुमार सोशलिस्ट युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)